योग की दृष्टि में नाभि बहुत ऊँचा स्थान् रखती है क्यों कि योग साधना का प्रारम्भ नाभि से ही होता है। योगीगण नाभि का विशेष ध्यान रखते हैं। यदि विचारपूर्वक देखा जाये तो योग साधना का प्रथम सोपान प्राणायाम है। योग के अनुसार नाभि प्राणों का संचयन स्थल है। यह मानव शरीर का संचालन बिन्दु है। उसी बिन्दु से प्राण ऊर्जा हृदय के माध्यम से मस्तिष्क को प्रेषित होती है। और मस्तिष्क, प्राण ऊर्जा को वायुवहा नाड़ियों के माध्यम से सारे शरीर में प्रवाहित करता है। इससे स्पष्ट है कि नाभि मनुष्य की सारी गतिविधियों का केन्द्रबिन्दु है। वह गति शारीरिक हो, मानसिक हो या हो आध्यात्मिक। यदि नाभि ऊर्जस्वित नहीं होगी और वह ऊर्जा का सम्यक प्रसारण नहीं रखती तो शारीरिक अवयवों में ऊर्जा शक्ति का ह्रास हो जायेगा और शरीर अस्वस्थ हो जायेगा। और इस कारण मन और आत्मा भी अस्वस्थ हो जायेंगे।
योगी पुरुष अपनी नाभि को सूक्ष्म प्राणायाम से ऊर्जस्वित करते हैं। नाभि के पूर्ण रूप से ऊर्जस्वित होने के बाद ही साधक हृदय केन्द्र की ओर बढते हैं। प्राणायाम द्वारा प्राण की और ध्यान द्वारा मन की होती है साधना। ध्यान जब अपनी चरम सीमा पर पहुँच कर समाधि में परिवर्तित हो जाता है तो उसे परमावस्था कहते हैं और उस अवस्था में योगी की स्थिति मस्तिष्क में जिस स्थान पर होती है - वह है सोमचक्र। यदि अचानक हृदय काम करना बन्द कर दे तब भी बीस से तीस मिनट तक नाभि केन्द्र सक्रिय रहता है। इस अवधि में किसी उपचार द्वारा हृदय को पुनः सक्रिय किया जा सकता है।
 

Kaaran Paatra

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  • Title Kaaran Paatra
    Author Shri Arun Kumar Sharma
    Language Hindi
    Publication Year: Second Edition - 2009
    Price Rs. 250.00 (free shipping within india)
    ISBN 9AGKPH
    Binding Type Hard Bound
    Pages x + 30 + 280 Pages
    Size 22.5 cm x 14.5 cm

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