मठ के व्यवस्थापक थे महायोगी महातपा! उन्हीं के संचालन में सारा कार्य होता था। उन्हीं के आदेश पर नये प्रवेश करने वाले साधकों को योग-तन्त्र आदि की दीक्षा दी जाती थी। सर्वप्रथम मुझे उन्हीं के सम्मुख उपस्थित किया गया था। काफी लम्बा-चौड़ा कक्ष था। कक्ष की दीवारें सुनहले रंग की थी जिनमें से सुनहले रंग का प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा था। ओंकार की मन्द-मन्द ध्वनि भी गूँज रही थी वहाँ पर। वह ध्वनि कहाँ से निकल रही थी, यह मेरी समझ में नहीं आया। मगर यह निश्चित था कि वह किसी व्यक्ति के कण्ठ से नहीं फूट रही थी। उसका उद्गम कुछ और ही था, जो मेरे लिये अज्ञात था।

कक्ष के मध्य में रक्तवर्ण और पीतवर्ण के पारदर्शक स्फ़टिक पाषाण का शतदल कमल पुष्प था, जो स्वयं प्रकाशित हो रहा था। मैंने देखा - उस स्वप्रकाशित कमल पुष्प पर एक दिव्य महापुरुष पद्मासन की मुद्रा में विराजमान थे। वही थे महतपस्वी, महायोगी श्री महातपा। देखने में वे बिल्कुल एक बालक प्रतीत हो रहे थे। लेकिन उनकी आयु सबसे अधिक थी। उनका शरीर भी गुलाबी रँग का और पारदर्शक था। और था पूर्ण अनावृत। गले में मोतियों जैसी माला थी, जिसमें से शुभ्र वर्ण की रश्मियाँ निकल रही थी। वे बिना पलक झपकाये सामने की ओर स्थिर दृष्टि से देख रहे थे। तेजोमय मुखमण्डल पर किसी भी प्रकार का भाव नहीं था।

प्रज्ञा ने आगे कहा - उस दिव्य महात्मा के कक्ष में प्रवेश करते ही मेरी आत्मा को जिस आनन्द और जिस शान्ति का अनुभव हुआ उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती मैं। निश्चय ही उसी आनन्द और शान्ति को परम आनन्द और परम शान्ति कहते होंगे योगीगण।

उसी आनन्द और शान्ति के सागर में आकण्ठ डूबी हुई मैं जब उस दिव्य महापुरुष को निहार रही थी, उसी समय न जाने कब, कैसे और कहाँ से आकर मेरे गले में सुन्दर खिले हुए ताज़े गुलाब के फूलों की माला झूल गयी। घोर आश्चर्य हुआ मुझे। तीव्र सुगन्धमय गुलाब के फूल इतने बड़े-बड़े और सुन्दर थे कि उन्हें इस संसार का नहीं कहा जा सकता।

पुष्प की माला का प्राप्त होना इस बात का संकेत था कि मुझे दीक्षा की आज्ञा परम योगी महातपा से प्राप्त हो गयी है। उसके बाद मुझे दीक्षा कक्ष में ले जाया गया। वहाँ भी एक महायोगी पद्मासन में बैठे हुए दिखलायी पड़े मुझको। वे भी बालक सदृश थे। लेकिन उनकी आयु भी काफ़ी थी। उनके नेत्र बन्द थे। चेहरे पर असीम अलौकिक दिव्य तेज था। मुझे बतलाया गया कि उनका नाम कैवल्यपाद है और सैंकड़ों वर्षों से इसी प्रकार समाधिस्थ बैठे हुए हैं।

कैवल्यपाद का जहाँ आसन था, उसके समीप स्फ़टिक की एक गोलाकर वेदी थी जिस पर स्वर्ण का लगभग दो फुट ऊँचा दीपाधार था। उस दीपाधार पर अष्टधातु के पात्र में एक दीप प्रज्वलित था। पात्र में तेल के स्थान पर कोई अज्ञात तरल द्रव भरा हुआ था, जिसका रंग सोने की तरह था। दीप की ज्योति में किसी प्रकार का कम्पन नहीं था। सबसे आश्चर्य की बात थी कि उस स्थिर ज्योति का प्रकाश अत्यन्त तीव्र था और पूरे कक्ष में फैल रहा था। बाद में ज्ञात हुआ कि वह दीप पिछले कई सौ वर्षों से जल रहा है और निरन्तर प्रकाश बिखेर रहा है।

Kundalini Shakti

SKU: 0015
₹475.00Price
  • Title Kundalini Shakti
    (The Serpent Power)
    Author Shri Arun Kumar Sharma
    Language Hindi
    Publication Year: Re-print - 2009
    Price Rs. 475.00 (free shipping within india)
    ISBN 9AGKSH
    Binding Type Hard Bound
    Pages xxviii + 592 Pages
    Size 22.5 cm x 14.0 cm

आस्था प्रकाशन

Astha Prakashan

B5/23 Awadhgarvi, Harishchandra road

Varanasi 221001

91-9621711803

91- 8948378992 (whatsapp)

aasthaprakashan651@gmail.com

© 2020 by Astha Prakashan