मृत्यु एक मंगलकारी क्षण है और एक आनन्दमय अनुभव है। मगर हम अपने संस्कार, वासना, लोभ आदि के कारण उसे दारुण और कष्टमय बना देते हैं। इन्हीं सबका संस्कार हमारी आत्मा पर पड़ा रहता है, जिससे हम मृत्यु के अज्ञात भय से हमेशा त्रस्त रहते हैं।

मृत्यु के समय एक नीरव विस्फोट के साथ स्थूल शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरु हो जाता है और शरीर को जला देने या जमीन में गाड़ देने के बाद भी ये परमाणु वातावरण में बिखरे रहते हैं। परन्तु इनमें फिर से उसी आकृति में एकत्र होने की तीव्र प्रवृत्ति रहती है। साथ ही इनमें मनुष्य की अतृप्त भोग-वासनाओं की लालसा भी बनी रहती है। इसी को प्रेतात्मा कहते हैं। प्रेतात्मा का शरीर वासनामय आकाशीय होता है। मृत्यु के बाद और प्रेतात्मा के पूर्व की अवस्था को 'मृतात्मा' कहते हैं। मृतात्मा और प्रेतात्मा में बस थोड़ा सा ही अन्तर है। वासना और कामना अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की होती हैं। स्थूल शरीर को छोड़कर जितने भी शरीर हैं - सब भोग शरीर हैं। मृतात्माओं के भी भोग शरीर हैं। वे अपनी वासनाओं-कामनाओं की पूर्ति के लिये जीवित व्यक्तियों का सहारा लेती हैं। मगर उन्हीं व्यक्तियों का, जिनका मन दुर्बल है अथवा जिनके विचार, भाव, संस्कार और वासनायें उनसे मिलती-जुलती हैं।

मृतात्माओं का शरीर आकाशीय होने के कारण उनकी गति प्रकाश की गति के समान होती है। वे एक क्षण में हज़ारों मील की दूरी तय कर लेती हैं। अपने आकर्षण केन्द्र की ओर वे तुरन्त दौड़ पड़ती हैं।

Mritaatmaao Se Sampark (Contacting the Souls)

₹200.00Price
  • Title Mritaatmaao Se Sampark
    (Contacting the Souls)
    Author Shri Arun Kumar Sharma
    Language Hindi
    Publication Year: First Edition - 1999
    Price Rs. 200.00 (free shipping within india)
    ISBN 8171242294
    Binding Type Hard Bound
    Pages viii + 220 Pages
    Size 22.0 cm x 14.0 cm

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