चारों तरफ हरियाली, सिन्दूरी आभा लिये प्रकाश्, गेरुवे रंग के मठ-मन्दिर लेकिन सभी अपने आप में मग्न। कहीं कोई ध्वनि नहीं। नीरव वातावरण। कहीं कोई ध्यान कर रहा था तो कुछ लोग जप कर रहे थे तो एक स्थान में बहुत से युवा सन्यासी हवन कृत्य में संलग्न थे। तभी मैंने देखा कि एक तेजस्वी, सन्यासी के समीप पत्थर की शिला पर बैठा है। उस पर मृग चर्म बिछा था। पद्मासन की मुद्रा में, गैरिक वस्त्र और रुद्राक्ष की माला पहने वे तेजस्वी ध्यानस्थ बैठे थे। उनके चेहरे से अपूर्व आभा निकल रही थी। चन्दन की सुगन्ध से पूरा वातावरण दिव्य लग रहा था।

मैं बोलना चाहा पर बोल नहीं पाया। लेकिन मेरी मस्तिष्क ऊर्जा बहुत तेज हो गई थी। ऐसा लगता था कि मेरी वाणी रुक गई हो। तभी विचार के माध्यम से वार्ता करने की प्रेरणा मिल रही थी अगोचर रूप से। तभी ध्यानस्थ सन्यासी की आवाज मेरे मानसपटल में गूँजने लगी। देखा तो वे ध्यानस्थ थे लेकिन उनकी वाणी कहें या विचार सम्प्रेषण मुझे साफ-साफ अनुभूत हो रही थी। वे कह रहे थे कि मैं इस समय वैश्वानर जगत में हूँ। दिव्यैश्वरी के अनुरोध पर तुम्हे मिलने की आज्ञा दी। अगर न मिलता तो यह एक संकल्प बन जाता। फ़िर कहीं न कहीं तुमसे मिलने का प्रयोजन बनता। इच्छा हो चाहे संकल्प हो वह बन्धन का कारण बनता है। इसलिये इच्छा या संकल्प का कम से कम होना साधकों के लिये आवश्यक है। दिव्यैश्वरी ने भी ऐसा ही किया था। जगत में जितना मानव निरपेक्ष और तटस्थ रहेगा उतना ही बन्धन मुक्त होगा। इस जगत में लोग बातें करते हैं केवल विचारों के माध्यम से। जिस जगत मे तुम रहते हो वहाँ विचार शब्दों के माध्यम से वाणी द्वारा प्रकट होते हैं यहाँ ऐसा नहीं है।

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प्रज्ञाचक्षु बोले - अरे हाँ! एक बात तो बतलाना भूल ही गया था । वह यह कि प्राणतोषिणि क्रिया की तरह ही एक यौगिक क्रिया है 'नाड़ी बन्ध' । जिस समय वह रहस्यमयी यौगिक क्रिया सम्पन्न होती है उसी समय शरीर जिस अवस्था में रहता है - स्थिर हो जाता है। शरीर पर, मन पर, प्राण पर, काल का, समय का और आयु का प्रभाव नहीं पड़ता । शरीर जिस अवस्था में रहता है उसे अवस्था में सैंकड़ों वर्ष तक रहता है । महात्मा ने बतलाया कि पिछले तीन सौ वर्षों से वे वर्तमान शरीर में ही है । नाड़ी बन्ध के समय जैसा था वैसा ही आज भी है और अभी दो सौ वर्ष पर्यन्त ऐसा ही रहेगा । क्या आपका शरीर कभी अस्वस्थ नहीं हुआ ? नहीं ! हो ही नहीं सकता । शरीर अस्वस्थ होता है प्राण के कारण । प्राण में व्यतिक्रम उत्पन्न होने पर ही रोग व्याधि उत्पन्न होती है और जब प्राण पर काल का प्रभाव पड़ना बन्द हो जाता है तो फिर प्रश्न ही नहीं उठता अस्वस्थ होने का ।

शरीर की आवश्यकता 'अन्न' यानि भोजन है । अन्न तत्व से रक्त और और रक्त तत्व से 'वीर्य' और 'वीर्य' से शरीर का निर्माण होता है । इसलिये अन्न प्रधान है । एक सांसारिक व्यक्ति के भोजन से एक योगी का भोजन अनेक अंकों में भिन्न होता है । शरीर की अपनी माँग है । क्योंकि शरीर प्रकृति के नियमों के आधीन होता है । आप शरीर की कैसे करते हैं पूर्ति ? इच्छा शक्ति से । साधारण व्यक्ति के पास इच्छा तो है लेकिन शक्ति नहीं । एक इच्छा की पूर्ति के लिये उसे विभिन्न प्रकार के कर्म करने पड़ते हैं तब कहीं जाकर इच्छा पूर्ण होती है । योगी के पास इच्छा के साथ-साथ शक्ति भी है और वह शक्ति है अवचेतन मन की शक्ति ।

तुम चार दिन से भूखे प्यासे हो । इस आवश्यकता को कैसे पूर्ण करोगे ? कर्मों के द्वारा ही न, भोजन की सामग्री लाओगे फिर भोजन बनाओगे फिर उसे खाओगे । इस गुफा में सभी वस्तुओं का अभाव है । न भोजन की सामग्री है न ही भोजन बनाने का साधन । फिर कैसे क्या होगा ? अब देखो मेरे इच्छा शक्ति । इतना कह कर महात्मा ने मुझे नेत्र बन्द करने का आदेश दिया और जब मैंने कुछ क्षणों के बाद अपनी आँखें खोली तो आश्चर्यचकित रह गया मैं । मेरे सामने थाली में मेरे रुचि का भोजन रखा था । बाद में तो नित्य मनोनुकूल भोजन मिलने लगा मुझे । जो कुछ मैं चाहता उसकी पूर्ति महात्मा कर देते थे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर । पूरे दो मास रहा मैं उस हिम गुफा में । इस अवधि में प्रज्ञाचक्षु से जो ज्ञानार्जन मैंने किया वह निःसन्देह महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सम्पत्ति समझी जायेगी ।

Tantram

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  • Title Tantram
    Author Shri Arun Kumar Sharma
    Language Hindi
    Publication Year: First Edition - 2013
    Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
    ISBN 9788190679657
    Binding Type Hard Bound
    Pages xiv + 86+ 368 Page
    Size 22 cm x 14 cm

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